पसीना है गंगा जल
जब किसने बहाया हैं
मेहनत से शोहरत का
सूरज उग पाया हैं
सपनों मे कर्मों की
रहती जहा गीता है
मस्तक वह पिता के
चरणों में झुक पाया है
अंधियारा रह रह कर आंसू को पीता है चलते ही रहना है कहती यह गीता है कर्मों का यह वट है निश्छल है कर्मठ है कर्मों का उजियारा युग युग तक जीता ह...
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