पसीना है गंगा जल
जब किसने बहाया हैं
मेहनत से शोहरत का
सूरज उग पाया हैं
सपनों मे कर्मों की
रहती जहा गीता है
मस्तक वह पिता के
चरणों में झुक पाया है
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...
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