खुद ही से जो पूछ रहा
खुद से करे सवाल
भीतर से वह सौम्य रहे
माता का वह लाल
जिसको सुख की चाह नहीं
उसको क्य़ा दुःख देत
दुःख के रस्ते यही मिले
क्या मिट्टी क्या रेत
अंतर्मन को सींच रहा
साधक धर कर ध्यान
रस पीकर के तृप्त हुआ
आत्मा हुई महान
प्राणों का है बीज़ रहा
आत्मा सूक्ष्म शरीर
निज को जो पहचान सका
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