माता मन का भाव पढ़ें
माँ मन की है प्रीत
नित ही नव निर्माण करे
सोचे सबका हित
माता के बिन नहीं मिले
शिक्षा और संस्कार
बिन माता के देह नहीं
निर्जीव यह संसार
माँ आँगन और द्वार रही
माता छत दीवार
छत की स्नेहिल छांव रही
सुरक्षित परिवार
माँ ज्ञाता और ज्ञान रही
शिल्पी का कौशल्य
सच्चे बन सत्कर्मों करो
देगी वह वात्सल्य
माता केवल देह नहीं
अनुभूति है बोध
अनुभूतियां शुध्द करे
हटते सब अवरोध
जीवन उसका सुखी रहा
जिसके मन संतोष
माँ सबको हैं देख रही
देखे गुण और दोष
माता सुख की छांव रही
माँ दुख में है धीर
सुख की छाया बनी रहे
दुख में न हो पीर
सबमें मम का भाव रहा
मम मे रहता मोह
जीवन है कठिनाई भरा
आरोह अवरोह
सुख में घर और द्वार रहे
दुख के नहीं पहाड
निर्भीक होकर कर्म करो
सिंह सी भरो दहाड़
बहुत सुन्दर रचना
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