बुधवार, 15 जुलाई 2026

हँसते हँसते मिट जाते हैं

अब भाव नही होते दर्पण 
जो आँखो से दिख जाते है 
न रही  चेतना चिन्गारी 
अब कलमकार बिक जाते है 
कोई स्वार्थ साथ आबाद रहा 
तलवे सत्ता के चाट रहा 
जो लिख रहे हैं चिन्गारी 
हँसते हँसते मिट जाते हैं

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हँसते हँसते मिट जाते हैं

अब भाव नही होते दर्पण  जो आँखो से दिख जाते है  न रही  चेतना चिन्गारी  अब कलमकार बिक जाते है  कोई स्वार्थ साथ आबाद रहा  तलवे सत्ता के चाट रहा...