उनके वो आंसु पोंछ रहा
जिनकी पीडा मे पानी था
जो दर्द बसा था सीने
वो दुख की ही राजधानी था
खाली खाली सा लगता था
वो हरियाली सा दिखता था
सौंदर्य नही था जीवन में
तन मन की होती हानि था
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...
बहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंसुंदर
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