रविवार, 11 मार्च 2018
रविवार, 25 फ़रवरी 2018
दिलवर की मुस्कान
घर हो मंदिर प्यार रहे प्यारा सा परिवार
प्यार सदा अनमोल रहा भावो का उपहार
एक प्यारा सा भाव रहा प्यार सा एक बोध
मन के आँगन प्यार रहा प्यार भरा अनुरोध
मन व्याकुल है तृप्त नहीं मुझको तू पहचान
मन के मांगे नहीं मिली प्रियतम की मुस्कान
तन मन पागल प्यार रहा नहीं मिला है चैन
आँखे नभ् को ताक रही बीत गई कई रैन
मीठी कोमल प्यारी सी होती लब की शान
मोहे मुझको न्यारी सी दिलवर की मुस्कान
मधुरिम होता होठो पर शब्दों का श्रृंगार
अब न छेड़ो कड़वे बोल धधके मन अंगार
प्यारा सा संसार रहे मीठे हो हर बोल
मन के आँगन प्यार रहा प्यार भरा अनुरोध
मन व्याकुल है तृप्त नहीं मुझको तू पहचान
मन के मांगे नहीं मिली प्रियतम की मुस्कान
तन मन पागल प्यार रहा नहीं मिला है चैन
आँखे नभ् को ताक रही बीत गई कई रैन
मीठी कोमल प्यारी सी होती लब की शान
मोहे मुझको न्यारी सी दिलवर की मुस्कान
मधुरिम होता होठो पर शब्दों का श्रृंगार
अब न छेड़ो कड़वे बोल धधके मन अंगार
प्यारा सा संसार रहे मीठे हो हर बोल
तू अपने हर सपने को वचनो से ही तोल
अर्थ गहरे व्यर्थ वह निकालती
स्वार्थ से कितने भरे है आईने
है बदलते प्यार के यहाँ मायने
खो गई इंसानियत तो अब कही
रिश्तो से है रस चुराया भाई ने
इंसानियत अब रक्त रंजीत हो गई है
सद भावनाये अब कहा पर खो गई है
करवटे ले रोज हम रोते रहे
वेदना शामिल जीवन में हो गई है
जो मनुष्यता हमें है पालती
अर्थ गहरे व्यर्थ वह निकालती
शब्द से घायल हुआ जाता है मन
वह ह्रदय पर घाव गहरे डालती
रविवार, 11 फ़रवरी 2018
संस्कार
दुरभि रही संधिया
और पैतरे कई लाये है
क्योकि
नैतिकता के मायने
नेता जी ने पाये है
झूठी रही दोस्ती
रचते रहे प्रपंच
नेता जी ने साध लिया
लूट लिया है मंच
शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018
टिक रहा विश्वास है
प्रकृति की वंदना का
होता तरीका खास है
निसर्ग में है स्वर्ग रहता
स्वर्ग अब वनवास है
उत्थित हिमाचय के हृदय में
सहजता का वास है
टहनियां और फूल पत्ते
कुदरती उल्लास है
जो रहा निर्भीक सा मन
जिंदगी वह खास है
हट रहा तम हर सवेरे
मन में जगा विश्वास है
फिर नया जीवन पाया
पायी फिर से आस है
हर्ष में है मग्न सारे
जग मग नया आकाश है
स्वर्ग भी उतरा जमीं पर
स्वर्ग का अहसास है
लक्ष्य की एक भूख सी है
हर मन मचलती प्यास है
धर चला अंगुल रथ पर
हे पार्थ क्यो? उदास है
इंदु है वह सिंधु गहरा
बिंदु मे ठहरी आस है
हर कही पाया है उसको
रचता रहा वह रास है
पिय मिलन आतुरता है
टिक रहा विश्वास है
बुधवार, 31 जनवरी 2018
शून्य रहा परिवेश
आग दिलो में लगी हुई ,राग घृणा और द्वेष
करुणा और वात्स्ल्य नहीं ,बचे यहाँ पर शेष
अंतर्मन में ध्यान करो बाहर हो मुस्कान
प्यारा भरा मन तृप्त रहे कर लो रस का पान
जीवन सारा बीत गया रह गई मन में टीस
मन है प्यासा मीत नही दुश्मन है दस बीस
अर्ध सत्य तो व्यर्थ रहा , सत्य रहा न शेष
सतगुण सारे लुप्त हुए ,शून्य रहा परिवेश
मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017
धन तेरस पर तुम भी सुन लो
निर्धन को न धन मिलता है
धन के बिन कैसा त्यौहार
धन के बिन है मस्त फकीरा
धन हेतु रौता बाजार
धन तेरस पर क्या क्या लाये
धन सच्चा होता व्यवहार
मन निर्धन तो कैसा धन है
तन मन वारो बारम्बार
ऐसा वैसा कैसा कैसा
कदम कदम पर पैसा
पैसो से है जुड़ता रिश्ता
पैसो पर है दारोम दार
धन से न मिल पाया तन है
धन देता केवल श्रृंगार
धन के पीछे सब है भागे
धन से होती है तकरार
धन पे तेरी नियत ठहरी
मन से मन की है दीवार
तू खूब खैले धन से मैले
धन न मिलता है हकदार
सपने तुम कितने भी बुन लो
धन तेरस पर तुम भी सुन लो
खाया पिया नहीं पचाया
धन से भोजन स्वल्पाहार
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