सोमवार, 6 जुलाई 2020

स्वदेशी से जीत गया मेरा वीर जवान

धोखे से हर युध्द लड़ा ,अब आये दुर्दिन
स्वदेशी से हार गया, चीनी ड्रैगन जिन्न

सीमाए अब रिक्त हुई लौट गया शैतान
स्वदेशी से जीत गया मेरा वीर जवान

स्वदेशी का मंत्र चला,दुश्मन की न खैर
सीमाए सुनसान हुई गरज रहा है शेर

सीमा से है भाग खड़ा उखड़ गये है टेंट
स्वदेशी से हांफ रही ,चीनी तोपे टैंक

स्वदेशी से शुध्द हुए ,पाये हमने बुध्द
हिंसक तेवर चला गया टला अभी है युध्द

एक देश परतंत्र  रहा एक देश गणतंत्र
एकमेव जब राष्ट्र रहा स्वदेशी का मन्त्र

रविवार, 21 जून 2020

श्रंध्दांजली जताई है


(1)
उन्होंने आज
 सैनिकों की शहादत पर 
अश्रुपूरित हो
श्रध्दांजलि जताई है
 और श्रद्धांजलि के नाम पर
 दो मिनट मौन रह कर
 चीन से आयातित मोमबत्तीया जलाई है
(2)
अब नही रह पाएगा
 बाज़ार में कोई चीनी समान है
 कही सस्ता सा मिल जाये मोबाईल 
बस यही अरमान है
(3)
स्वदेशी की बात करते हुए 
गला रुंधा है 
मानो सीमाओं ने पुकारा है
पर क्या करे?
 इस  दौर में
 सस्ता चीनी माल ही तो
 आजीविका का  सहारा है

रविवार, 7 जून 2020

भरी गर्मियों में पारा उसका चढ़ा है

सवेरा सूरज की किरण से लड़ा है 
तमस का शकुनि उधर चुप खड़ा है 

जिसे हर तरफ से है षड्यंत्र घेरे 
रही मुंडमाला है वही मन्त्र फेरे 
चला कर्म के पथ क्षत विक्षत पड़ा है

हुई पस्त काया  छाया की जय है 
रहा  छद्म शत्रु रहा दुराशय है
चला ऐसा युध्द जो निरंतर बढ़ा है 

कभी मस्त मौसम कभी उठते शोले 
रही जब नमी तो बहते है रेले
भरी गर्मियों में पारा उसका चढ़ा है

शनिवार, 6 जून 2020

ठिठकी हुई दुनिया

स्वीच मिले मोबाईल साइलेंट हुए फ़ोन है
अदृश्य हुआ शत्रु पक्ष मृत्यु हुई मौन है
 बीमार है लाचार हैं संहार का संसार है
कहर है कुदरत का ये कौनसा त्रिकोण है

मौत भी चली आई  कोरोना के मारे है
बहती हुई सदिया ,नदिया के किनारे है
कौनसा है संकट जो आज हमने पाया है
ठिठकी हुई दुनिया है खुद के सहारे है

संकट हुआ विकट काला सा साया है 
विजय का महामंत्र हम सबने गाया है 
सबका ही सपना है झुकना न रुकना है
बदलेंगे अब हम सब ,जीना अब आया है



गुरुवार, 4 जून 2020

मानवता की लाश

धन उसके ही पास रहा , जिसका उन्नत मन 
मन तो इक विश्वास रहा , मन तो है  दर्पण

रिश्तों से वह शून्य रहा , कटुता जिसके पास
मानव का मन टूट रहा , टूट रहा विश्वास

मानवता है ढूँढ रही ,कहा है अपनापन
शब्दो से है बात बनी, शब्दो से अन बन

धरती करुणा भूल रही , विचलित है आकाश
दिखती चारो और रही , मानवता की लाश




बुधवार, 3 जून 2020

जीवन पूर्ण विराम

जीवन देकर चली गई किसकी थी यह चूक
हथिनी बच्चे से से कहे कितनी महंगी भूख

मौसम की कोई बात नही बिन मौसम का खेल
कुदरत बदला मांग रही है झेल सके तो झेल

जो होता अभ्यस्त नही जीवन पूर्ण विराम
भीतर भीतर ध्यान लगा मन को दे विश्राम

पशुवत जीवन बीत रहा पशुवत विचरे मन 
मानवता तो बोध रही कहा है मानव मन

पशु के जीवन घात रही जीवन मृत्यु खेल
कुदरत ने है खेल रचा , कस दी नाक नकेल

शनिवार, 30 मई 2020

स्वजन ने स्व लूट लिया

 दुर्बल होकर देह गली,क्यो चिंतित है मन
चिंतन को अस्वस्थ करे दूषित संचित धन

मन तो दृढ़ संकल्प रहा,रहा न फिर भी मान
स्वजन ने स्व लूट लिया, निजता का अभिमान

 दुर्जुन हरदम स्वांग रचे ,धरते दृष्टि मलीन
सज्जन तो पाखंड बचे ,होते पूज्य कुलीन

गुरु चरणन आबध्द रहा, मिला उसे ही ज्ञान
 साधक संत महंत कुलीन करता है कल्याण

वो नदी है

नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है  टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई  वो है नेकी न बदी है  दिन होती रात ह...