गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

पिता हरदम मौन खड़े वे पर्वत उपमा

जिसका निश्छल प्रेम रहा, वह प्यारी है माँ
पिता हरदम मौन खड़े, वे पर्वत उपमा

कितने कितने घाव सहे , फिर भी रहते चुप
पिता का सामर्थ्य रहा, सूरज की ज्यो धूप

पिता होते शुध्द हवा, प्राणों का आधार
पिता जी है पूज्य रहे, कर इनका सत्कार

कानो में है गूँज रही , पिता की आवाज
पिता जी गुमसुम रहे, पिता जी नाराज

पिता जी है गुजर गये , गुजरा मन का बल
पिता के बिन विश्व लगा, जंगल और दलदल

चेहरा तेरा बाँच रहे, पिता जी है आज
उनसे गम भी छुपे नही , छुपे नही है राज

पिता हिमवत जमे नही, वे बरसे बादल
पिता होते पूर्ण सहज , वे गिरी विंध्याचल

माता कुछ है सोच रही , गाती मीठे गीत
भृकुटी पिता तान रहे , दृष्टि में कुछ हित

माता तो एक राग रही पितृवत है छन्द
मुठ्ठी जिनकी खुली नही , होती वह सौगंध

पिता से संसार मिला , पिता से घर बार 
पिता जी के चरणों मे , वंदन बारम्बार

पितृवत है ज्ञान रहा, पितृवत अनुभव
पिता जी से सीख मिली , जीवन है सम्भव

1 टिप्पणी: