रविवार, 1 अप्रैल 2018
सोमवार, 12 मार्च 2018
झुक जाता आसमान है
जीवन में गौरव और होता स्वाभिमान है
कठिनाइया कितनी भी जीत जाता ईमान है
व्यक्तित्व में ऊंचाइयां उसने यहाँ पाई है
निकलता है सूरज सा झुक जाता आसमान है
जीवन में गौरव है सौरभ है छाया है
खुशियों की दुनिया है प्रियतम को पाया है
मस्ती की कश्ती है सपनो की बस्ती है
सब कुछ है अपनों में सपनो को पाया है
रविवार, 11 मार्च 2018
भरता रहूँ उड़ान
तू प्रीती का गीत रही भीतर की मुस्कान
तुझसे जीवन पाऊ मै भरता रहूँ उड़ान
इस जग में जहाँ प्यार रहा सुख है अपरम्पार
गहनों में हो पायल तुम जीवन की रफ़्तार
तुम धड़कन और सांस रही अमृत का रसपान
तुझपे वारा ये तन मन जो भी कुछ है शेष
तू मौसम मधुमास भरी तू विचार विशेष
मरते दम तक साथ रहे निकले संग ही प्राण
सारा जीवन प्यार मिले प्राणों का आधार
सजनी तेरे साजन पर रख लेना ऐतबार
एक नेक हूँ साथ सदा यही सत्य ही जान
तुझसे सच्चा प्यार मिला जीवन को आकार
जीवित मेरा स्वप्न रहा तू नदिया की धार
तू ही मन की मीत रही जीवन का सम्मान
रविवार, 25 फ़रवरी 2018
दिलवर की मुस्कान
घर हो मंदिर प्यार रहे प्यारा सा परिवार
प्यार सदा अनमोल रहा भावो का उपहार
एक प्यारा सा भाव रहा प्यार सा एक बोध
मन के आँगन प्यार रहा प्यार भरा अनुरोध
मन व्याकुल है तृप्त नहीं मुझको तू पहचान
मन के मांगे नहीं मिली प्रियतम की मुस्कान
तन मन पागल प्यार रहा नहीं मिला है चैन
आँखे नभ् को ताक रही बीत गई कई रैन
मीठी कोमल प्यारी सी होती लब की शान
मोहे मुझको न्यारी सी दिलवर की मुस्कान
मधुरिम होता होठो पर शब्दों का श्रृंगार
अब न छेड़ो कड़वे बोल धधके मन अंगार
प्यारा सा संसार रहे मीठे हो हर बोल
मन के आँगन प्यार रहा प्यार भरा अनुरोध
मन व्याकुल है तृप्त नहीं मुझको तू पहचान
मन के मांगे नहीं मिली प्रियतम की मुस्कान
तन मन पागल प्यार रहा नहीं मिला है चैन
आँखे नभ् को ताक रही बीत गई कई रैन
मीठी कोमल प्यारी सी होती लब की शान
मोहे मुझको न्यारी सी दिलवर की मुस्कान
मधुरिम होता होठो पर शब्दों का श्रृंगार
अब न छेड़ो कड़वे बोल धधके मन अंगार
प्यारा सा संसार रहे मीठे हो हर बोल
तू अपने हर सपने को वचनो से ही तोल
अर्थ गहरे व्यर्थ वह निकालती
स्वार्थ से कितने भरे है आईने
है बदलते प्यार के यहाँ मायने
खो गई इंसानियत तो अब कही
रिश्तो से है रस चुराया भाई ने
इंसानियत अब रक्त रंजीत हो गई है
सद भावनाये अब कहा पर खो गई है
करवटे ले रोज हम रोते रहे
वेदना शामिल जीवन में हो गई है
जो मनुष्यता हमें है पालती
अर्थ गहरे व्यर्थ वह निकालती
शब्द से घायल हुआ जाता है मन
वह ह्रदय पर घाव गहरे डालती
रविवार, 11 फ़रवरी 2018
संस्कार
दुरभि रही संधिया
और पैतरे कई लाये है
क्योकि
नैतिकता के मायने
नेता जी ने पाये है
झूठी रही दोस्ती
रचते रहे प्रपंच
नेता जी ने साध लिया
लूट लिया है मंच
शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018
टिक रहा विश्वास है
प्रकृति की वंदना का
होता तरीका खास है
निसर्ग में है स्वर्ग रहता
स्वर्ग अब वनवास है
उत्थित हिमाचय के हृदय में
सहजता का वास है
टहनियां और फूल पत्ते
कुदरती उल्लास है
जो रहा निर्भीक सा मन
जिंदगी वह खास है
हट रहा तम हर सवेरे
मन में जगा विश्वास है
फिर नया जीवन पाया
पायी फिर से आस है
हर्ष में है मग्न सारे
जग मग नया आकाश है
स्वर्ग भी उतरा जमीं पर
स्वर्ग का अहसास है
लक्ष्य की एक भूख सी है
हर मन मचलती प्यास है
धर चला अंगुल रथ पर
हे पार्थ क्यो? उदास है
इंदु है वह सिंधु गहरा
बिंदु मे ठहरी आस है
हर कही पाया है उसको
रचता रहा वह रास है
पिय मिलन आतुरता है
टिक रहा विश्वास है
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