गुरुवार, 12 नवंबर 2020

धन से है तेरस

दीपक  से अनिष्ट टले ,कर लो दीप विधान
प्राणों को चैतन्य करो, दीपक का आव्हान

भीतर से जो दीप्त रहे ,उजले रहे विचार
अंधकार चहु और हटे, मन से हटे विकार

भीतर भीतर शोर रहा , भीतर से है शान्त
भीतर से उद्विग्न हुआ, भीतर से आक्रान्त

भीतर ही अंधियार रहा, भीतर रहा विहान 
भीतर से क्यो भाग रहा, भीतर है भगवान 

धन से धन ही बढ़ा यहाँ, धन बिन जस का तस
धन बिन होती नही दीवाली, धन से है तेरस

रविवार, 8 नवंबर 2020

साहस की दरकार

जैसे जीवन अश्व रहा, धीरज उसकी लगाम
साहस से है धैर्य बड़ा, धैर्यवान बलवान

निष्ठुर सा व्यवहार रहा ,पत्थर से है भाव 
पत्थर सा इन्सान मिला , घावों पर फिर घाव

दिखता था माधुर्य यहाँ , कोमल सा व्यवहार
ऐसे भी थे लोग भले, जो चले गये भव पार

लेखन में वो धार नही , लेखन नही कटार
सिहासन न डोल रहा, साहस की दरकार

शनिवार, 7 नवंबर 2020

ओछे ओछे खेल

बिगड़े उनके बोल रहे , भड़के है जज्बात
जब भी उनसे बात हुई , बिगड़े है हालात

जितने उनके साथ रहे , हम उतने परिचित
उतना ही अलगाव रहा,  उतने ही विचलित

जितने अन्तर्बन्ध रहे ,उतने रहे प्रबंध
दोहरेपन ने छीन लिये, सामाजिक संबंध

रिश्तो पर है गाज गिरी, स्वारथ की विष बैल
हम सबने है खेल लिये , ओछे ओछे खेल


बुधवार, 4 नवंबर 2020

ऐसा क्या सन्यास भला

कैसा यह अभिसार रहा,कैसा रहा प्रणय
हृदय से अनुराग गये, दृष्टिगत अभिनय

मन की तृष्णा वही रही ,रहा हृदय में मोह
ऐसा क्या सन्यास भला, जिसमे विरह बिछोह

मन के भीतर भाव रहे, सीता के लव कुश
खुशिया जिसको नही मिली ,वह फिर भी है खुश

दिल से दिल के नही मिले जितने भी तार
कितने भी वे साथ रहे ,फिर भी है तकरार

ऐसी करवा चौथ रही

स्नेह शून्य हर भाव रहा, नही प्रणय अनुरोध
घूमता फिरता चांद रहा ,ऐसी करवा चौथ

नित होता संग्राम रहा, नित नित रहे विवाद
ऐसे भी कुछ लोग यहाँ, जो इनके अपवाद

सजना को वो याद करे, भरे याद में मांग
सजनी करवा चौथ रही , अदभुत रचती स्वांग

जब तक तेरा प्यार रहा, तब तक यह संसार
मुख में मीठे बोल रहे , मत उगलो अंगार

सोमवार, 2 नवंबर 2020

महके प्राण बसन्त

सूरज बिन प्रभात नही , चंदा बिन न रात
नभ से तारे ताक रहे , उनसे कर लो बात

भीतर भीतर श्वास भरो, छोड़ो श्वास महन्त
पूजा कर फिर ध्यान धरो ,महके प्राण बसन्त

प्राणों का संधान रहा, यौगिक प्राणायाम
सब रोगों से मुक्त करे , प्रतिदिन का व्यायाम

साँसों का आरोह रहा , साँसों का अवरोह
सांसो से क्यो हार रहा, साँसों को तू दोह


रविवार, 1 नवंबर 2020

उतना ही आकाश

उर के भीतर राम रहे , उर के भीतर कृष्ण 
फिर भी किंकर्तव्यविमूढ़ , कितने तेरे प्रश्न

लाली नभ पर फैल रही , सूरज पर रख आस
जितना है विश्वास भरा, उतना ही आकाश 

तुझमे तेरे देव रहे , रख धीरज सदैव
भव में नैय्या तैर रही , नैय्या को तू खैव

जलधि भीतर द्वीप रहे , जलधि में है सीप
जलधि लांघे तीर नही , तू जलधि से सीख

जलधि जल का राज रहा, जलधि रहे जहाज
जलधि से जल खींच रहा , सूरज कल और आज

जलधि का सम्मान करो, पूजो जल को मित्र
जल से निर्मल भाव रहा, तन मन हुए पवित्र

नर्म कोमल सी हथेली

झर गई बारिश से कलियाँ  पत्तिया बूँदों  ने धोई  है यहा अधरों पे खुशियां  क्या कर गया श्रृंगार कोई  डालियों  पर फूल अटके  शूल भी आँखों को खटके...