प्राणों को चैतन्य करो, दीपक का आव्हान
भीतर से जो दीप्त रहे ,उजले रहे विचार
अंधकार चहु और हटे, मन से हटे विकार
भीतर भीतर शोर रहा , भीतर से है शान्त
भीतर से उद्विग्न हुआ, भीतर से आक्रान्त
भीतर ही अंधियार रहा, भीतर रहा विहान
भीतर से क्यो भाग रहा, भीतर है भगवान
धन से धन ही बढ़ा यहाँ, धन बिन जस का तस
धन बिन होती नही दीवाली, धन से है तेरस