जब ज्योति से ज्योत जली
जगता है विश्वास
जीवन में कोई सोच नहीं
वह करता उपहास
होता है जो मूढ़ मति
जाने क्या कर्तव्य
जिसका होता ध्येय नहीं
उसका न गंतव्य
गुजरा पल तो बीत गया
तू कल को है सीच
इस पल में जब ज्योत जली
रोशन है हर चीज
थोडी थोड़ी गल रही है थोड़ी थोड़ी जल रही है है पुरानी वेदनाये गीत में जो ढल रही है जो हमारे हित में थीं जो तुम्हारी...