मंगलवार, 4 नवंबर 2014
सोमवार, 3 नवंबर 2014
भाव के नहीं ईख है
जिंदगी है धार नदिया है
दर्द है तकलीफ है
हार तो मिलती रही है
जीत में कहा सीख है
चाहतो के मिल रहे शव
,राहते मिलती नहीं है
प्यार की तुलसी है झुलसी
नहीं वक्त की मिली भीख है
हर तरफ चिंगारियाँ है
किलकारियाँ है चीख है
प्यास ठहरी अधबुझी है
फिर मिली कालिख है
विष घोले है सपोले
होले होले मन टटोले
नीम करेले है कसैले
भाव के नहीं ईख है
शनिवार, 25 अक्टूबर 2014
जीवन गीता श्लोक हो
घर आँगन में दीप जला लो ,ह्रदय में आलोक हो
उजियारे से प्रीत लगा लो ,मन निर्भय अशोक हो
जग जननी माँ दुर्गा लक्ष्मी ,देती यश धन बल है
गुणों से पूजित हो जाते ,गुण बिन सब निष्फल है
गुण को पा लो स्वप्न सजा लो ,धरा स्वर्ग का लोक हो
ज्योति से होता उजियारा, ज्योतिर्मय जगदीश है
ज्योतिर्मय जग मग आशाये ,ज्योति का आशीष है
चमक दमक दीपो की ज्योति ,जीवन गीता श्लोक हो
मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014
दीवाली के दीप जले है, दीपो का त्यौहार है
दीवाली के दीप जले है, दीपो का त्यौहार है
मिली रोशनी अंधियारे को ,खुशियो की बौछार है
मिटटी से बन जाता सब कुछ, माटी करती प्यार है
मिटटी के दीपक कर देते ,धरती का श्रृंगार है
मिटटी से ही शिल्प ढला है ,शिल्पी का औजार है
गौरी की छम छम पायलिया , बैलो के बजते घुँघरू
रंगो से सजती दीवारे ,मस्ती की डम डम डमरू
दीपक सा जग -मग हो तन मन रोशन हर दीवार है
कर्मो का यह दीप पर्व है, करम धरम का मर्म है
शुभ कर्मों का सुफल होगा ,नीच कर्म से शर्म है
बिना कर्म के आज नहीं है ,सपने हो बेकार है
मिली रोशनी अंधियारे को ,खुशियो की बौछार है
मिटटी से बन जाता सब कुछ, माटी करती प्यार है
मिटटी के दीपक कर देते ,धरती का श्रृंगार है
मिटटी से ही शिल्प ढला है ,शिल्पी का औजार है
गौरी की छम छम पायलिया , बैलो के बजते घुँघरू
रंगो से सजती दीवारे ,मस्ती की डम डम डमरू
दीपक सा जग -मग हो तन मन रोशन हर दीवार है
कर्मो का यह दीप पर्व है, करम धरम का मर्म है
शुभ कर्मों का सुफल होगा ,नीच कर्म से शर्म है
बिना कर्म के आज नहीं है ,सपने हो बेकार है
सोमवार, 20 अक्टूबर 2014
दिवाली है
अमीर हो या गरीब
उजला धन हो तो दिवाली है
जन निर्धन हो या सम्पन्न
मन प्रसन्न हो तो दिवाली है
ब्लैक मनी नहीं है हनी
व्यवस्था भ्रष्ट हो तो जिंदगी काली है
प्रशासन सख्त हो कामकाज में
व्यस्त हो तो दिवाली है
जीवन हरा भरा हो
अपराधी डरा डरा हो तो दिवाली है
सेवा ही धाम हो
भक्ति निष्काम हो तो खुशहाली है
धड़कन में राम हो
मन में विश्राम हो तो दिवाली है
उजला धन हो तो दिवाली है
जन निर्धन हो या सम्पन्न
मन प्रसन्न हो तो दिवाली है
ब्लैक मनी नहीं है हनी
व्यवस्था भ्रष्ट हो तो जिंदगी काली है
प्रशासन सख्त हो कामकाज में
व्यस्त हो तो दिवाली है
जीवन हरा भरा हो
अपराधी डरा डरा हो तो दिवाली है
सेवा ही धाम हो
भक्ति निष्काम हो तो खुशहाली है
धड़कन में राम हो
मन में विश्राम हो तो दिवाली है
रविवार, 24 अगस्त 2014
धर्म अंधी आस्था नहीं भगवान विष्णु का चक्र सुदर्शन है
धर्म जीना सीखाता है
धर्म मारना नहीं मरना सीखाता है
पीडितो असहायों की सेवा करना , पीड़ा हरना
दुःख दूर करना सीखाता है
धर्म माया नहीं छाया है
धर्म वही है जो सदाचार के पथ चल आया है
धर्म उजाले का सूरज है
अन्धेरा ढला तो दिया है
धर्म के पथ पर चल कर
सुकरात और दयानंद ने जहर को पीया है
धर्म कर्म से विमुख कभी नहीं रहा है
कर्म को धर्म गीता में भगवन ने कहा है
धन्य वे है जो धर्म निभा कर कर्मवीर हुए है
सच पूछो तो वे कर्म वीर ही नहीं धर्म वीर हुए है
धर्म वह है जो निर्दोष के प्राण बचाता है
एक अबला की इज्जत और सज्जनता का मान बचाता है
झूठ और मक्कारी को नंगा कर सच्चाई और अच्छाई को गले लगाता है
धरम ईमानदारी और बेईमानी को अपने सही मुकाम तक पहुँचाता है
धर्म अंधी आस्था नहीं भगवान विष्णु का चक्र सुदर्शन है
सच्चाई की ताकत में ही धर्म है भगवन का होता दर्शन है
धर्म मारना नहीं मरना सीखाता है
पीडितो असहायों की सेवा करना , पीड़ा हरना
दुःख दूर करना सीखाता है
धर्म माया नहीं छाया है
धर्म वही है जो सदाचार के पथ चल आया है
धर्म उजाले का सूरज है
अन्धेरा ढला तो दिया है
धर्म के पथ पर चल कर
सुकरात और दयानंद ने जहर को पीया है
धर्म कर्म से विमुख कभी नहीं रहा है
कर्म को धर्म गीता में भगवन ने कहा है
धन्य वे है जो धर्म निभा कर कर्मवीर हुए है
सच पूछो तो वे कर्म वीर ही नहीं धर्म वीर हुए है
धर्म वह है जो निर्दोष के प्राण बचाता है
एक अबला की इज्जत और सज्जनता का मान बचाता है
झूठ और मक्कारी को नंगा कर सच्चाई और अच्छाई को गले लगाता है
धरम ईमानदारी और बेईमानी को अपने सही मुकाम तक पहुँचाता है
धर्म अंधी आस्था नहीं भगवान विष्णु का चक्र सुदर्शन है
सच्चाई की ताकत में ही धर्म है भगवन का होता दर्शन है
शनिवार, 2 अगस्त 2014
मुसीबतो का करते रहे इन्तजार है
उन्हें मुसीबतो से कम और सुविधाओ से बहुत प्यार है
हम उपाय खोज कर मुसीबतो का करते रहे इन्तजार है
उनके लिए मुसीबतो का आना एक खौफ है
मुश्किलो से होती रही हमारी नोक झोक है
जीवन में मुसीबतो का सिलसिला है
मुसीबतो के सहारे ही तो हमें यह सब कुछ मिला है
जीवन के समंदर में कही मीठा तो कही खारा जल है
करते रहो लहरो को पार
क्षितिज के उस पार उजला कल है
उनकी कथनी और करनी में रहा बहुत भेद है
मनसा वाचा कर्मणा से हम एक रहे
तो जीवन गीता उपनिषद वेद है
परिश्रम के पसीने से जिसने कर्मो को सींचा है
हर संकल्प में बल है
हर शब्द एक ब्रह्म और वाक्य उसकी ऋचा है
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