सोमवार, 3 नवंबर 2014

भाव के नहीं ईख है

जिंदगी है धार नदिया  है 
दर्द है तकलीफ है 
हार तो मिलती रही है 
जीत में कहा सीख है 
चाहतो के मिल रहे शव
,राहते  मिलती नहीं है 
प्यार की तुलसी है झुलसी 
नहीं वक्त की मिली भीख है

हर तरफ चिंगारियाँ है 
किलकारियाँ है चीख है 
प्यास ठहरी अधबुझी है
फिर मिली कालिख है
विष घोले  है सपोले  
होले  होले मन टटोले
नीम करेले है कसैले 
भाव के नहीं ईख है

शनिवार, 25 अक्टूबर 2014

जीवन गीता श्लोक हो

घर आँगन में दीप  जला लो ,ह्रदय में आलोक हो 
उजियारे से प्रीत लगा लो ,मन  निर्भय अशोक हो 

जग जननी माँ दुर्गा लक्ष्मी ,देती यश धन बल है 
गुणों से पूजित हो जाते ,गुण  बिन सब निष्फल है
गुण  को पा लो स्वप्न सजा लो ,धरा स्वर्ग का लोक हो 

ज्योति से होता उजियारा, ज्योतिर्मय जगदीश है 
ज्योतिर्मय जग मग आशाये ,ज्योति का आशीष है 
चमक दमक दीपो की ज्योति ,जीवन गीता श्लोक हो

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

दीवाली के दीप जले है, दीपो का त्यौहार है

दीवाली के दीप  जले है, दीपो का त्यौहार है 
मिली रोशनी अंधियारे को ,खुशियो की बौछार है 

मिटटी से बन जाता सब कुछ, माटी करती  प्यार है 
मिटटी के दीपक कर देते ,धरती का श्रृंगार है 
मिटटी से ही शिल्प ढला  है ,शिल्पी का  औजार है 

गौरी की छम छम पायलिया , बैलो के बजते घुँघरू 
रंगो से सजती दीवारे ,मस्ती की डम डम  डमरू 
दीपक सा जग -मग हो तन मन रोशन हर दीवार है 

कर्मो का यह दीप  पर्व है, करम धरम का मर्म है 
शुभ कर्मों  का सुफल होगा ,नीच कर्म से शर्म है 
बिना कर्म के आज नहीं है ,सपने हो बेकार है

सोमवार, 20 अक्टूबर 2014

दिवाली है

अमीर हो या गरीब 
उजला धन हो तो दिवाली है 
जन निर्धन हो या सम्पन्न 
मन प्रसन्न हो तो दिवाली है 
ब्लैक मनी नहीं है हनी 
व्यवस्था भ्रष्ट हो तो जिंदगी काली है 
प्रशासन सख्त हो  कामकाज में
 व्यस्त हो तो दिवाली है 
जीवन हरा भरा हो 
अपराधी  डरा  डरा  हो तो दिवाली है
 सेवा  ही धाम हो 
भक्ति निष्काम हो तो खुशहाली है 
धड़कन में राम हो
 मन में विश्राम हो तो दिवाली है

रविवार, 24 अगस्त 2014

धर्म अंधी आस्था नहीं भगवान विष्णु का चक्र सुदर्शन है

धर्म जीना सीखाता है 
धर्म मारना नहीं मरना  सीखाता है 
पीडितो असहायों की सेवा  करना , पीड़ा हरना 
दुःख दूर करना सीखाता है 


धर्म माया नहीं छाया है
 धर्म वही  है जो सदाचार के पथ चल आया  है
धर्म उजाले का सूरज है 
अन्धेरा ढला  तो दिया है 
धर्म के पथ पर चल कर 
सुकरात और दयानंद ने जहर को पीया है 

धर्म कर्म से विमुख कभी नहीं रहा है 
कर्म को धर्म गीता में भगवन ने कहा है 
धन्य वे है जो धर्म निभा कर कर्मवीर हुए है 
सच पूछो तो वे कर्म वीर ही नहीं धर्म वीर हुए है 

धर्म वह है जो निर्दोष के प्राण बचाता है 
एक अबला की इज्जत और सज्जनता का मान बचाता है 
झूठ और मक्कारी को नंगा कर सच्चाई और अच्छाई को गले लगाता है 
धरम ईमानदारी और बेईमानी को अपने सही मुकाम तक पहुँचाता है 
धर्म अंधी आस्था नहीं भगवान विष्णु का चक्र सुदर्शन है 
सच्चाई की ताकत में ही धर्म है भगवन का होता दर्शन है

शनिवार, 2 अगस्त 2014

मुसीबतो का करते रहे इन्तजार है

उन्हें मुसीबतो से कम और सुविधाओ से बहुत प्यार है 
हम उपाय खोज कर मुसीबतो का  करते रहे इन्तजार है
उनके लिए मुसीबतो का आना एक खौफ है 
मुश्किलो से होती रही हमारी नोक झोक है 
जीवन में मुसीबतो का सिलसिला है 
मुसीबतो के सहारे ही तो हमें यह सब कुछ मिला है 
जीवन के समंदर में कही मीठा तो कही खारा जल है 
करते रहो लहरो को पार 
क्षितिज के उस पार उजला  कल है 
उनकी कथनी और करनी में रहा बहुत भेद है 
मनसा वाचा कर्मणा से हम एक रहे 
तो जीवन गीता उपनिषद वेद है 
परिश्रम के पसीने से जिसने कर्मो को सींचा है 
हर संकल्प में बल है
 हर शब्द एक ब्रह्म और वाक्य उसकी ऋचा है

ज़िंदगी का कल रही

थोडी थोड़ी गल रही है   थोड़ी थोड़ी जल रही है  है पुरानी वेदनाये   गीत में जो ढल रही है  जो हमारे हित में थीं  जो तुम्हारी...