झीलों की गहराइयां
नभ से निकली उतर रही
कैसी है परछाईया
उड़ती हुई पतंग
सबने बाँची नभ में नाची
ठहरी कही उमंग
बच्चो की होती किलकारी
खुशियो की शहनाईयां
जीवन हो संक्रांति
मिल मिल कर के बिछुड़ रही
जीवन से सुख शांति
अपनापन था गुजर गया
न होगी भरपाईया
प्यार पूजा है आस्था है अगरबत्ती है
प्यार की अनुभूति रूह तक उतरती है
प्यार उन्माद नही है यौवन का
प्रीति एक प्रतीति है जो टूट नही सकती है
बिखरे हुए राहो पे कांटे उड़ती रही यह धूल है
टूटती रही आशाये है उगते रहे बबूल है
जिंदगी रोने लगी है जब नही हो तुम
अब नही शायद रही है किस्मत में बुलबुल है
सपने है आंखों में
दिल मे अरमान है
अपनो का आँगन है
रहती मुस्कान है
तेरा भी मेरा है
मेरा भी तेरा है
मिल जुल के रहना ही
खुशियो की खान है
मौसम है सर्दी का
सूरज की धूप
महका है यौवन धन
निखरा है रूप
दस्तक है ठंडक की
मिलता न चैन
मुन्ना और मुन्नी अब
सो जाते गुप् चुप
गहरा गहरा जल हुआ गहरे होते रंग
ज्यो ज्यो पाई गहराई पाई नई उमंग
गहराई को पाइये गहरा चिंतन होय
उथलेपन में जो रहा मूंगा मोती खोय
गहरा ठहरा जल हुआ ठहरा मन विश्वास
ठहरी मन की आरजू पाई है नव आस
गहराई में खोज मिली गहरे उठी दीवार
गहराई न जाइये गहरी गम की मार
ऊंचाई से उतर रहे लेकर चिंतन वेद
जीवन तो समझाईये गहरे है मतभेद
थोडी थोड़ी गल रही है थोड़ी थोड़ी जल रही है है पुरानी वेदनाये गीत में जो ढल रही है जो हमारे हित में थीं जो तुम्हारी...