अब भाव नही होते दर्पण
जो आँखो से दिख जाते है
न रही चेतना चिन्गारी
अब कलमकार बिक जाते है
कोई स्वार्थ साथ आबाद रहा
तलवे सत्ता के चाट रहा
जो लिख रहे हैं चिन्गारी
हँसते हँसते मिट जाते हैं
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...