जो आँखो से दिख जाते है
न रही चेतना चिन्गारी
अब कलमकार बिक जाते है
कोई स्वार्थ साथ आबाद रहा
तलवे सत्ता के चाट रहा
जो लिख रहे हैं चिन्गारी
हँसते हँसते मिट जाते हैं
झर गई बारिश से कलियाँ पत्तिया बूँदों ने धोई है यहा अधरों पे खुशियां क्या कर गया श्रृंगार कोई डालियों पर फूल अटके शूल भी आँखों को खटके...