गुरुवार, 5 सितंबर 2013

खुशिया

खुशिया मिलती नहीं खुशिया चुराई जाती है
रिश्तो को  सींचने से खुशिया पाई जाती है
जब हम दूसरो को खुशिया देते है तो किसी पर अहसान नहीं करते है
अपने भीतर को खुशियों से संजोते है 
खुशियों में जीते है खुश होकर मरते है
ख़ुशी की अपनी अपनी परिभाषाये है
खुश होकर जिए यह हर जन की आशाये है
पर  आशाये ही रखे यह तथ्य व्यर्थ है
तरह तरह से खुश रहे सही खुशिया पाए ऐसे सुख से हम हुए समर्थ है
ख़ुशी कभी सुख सुविधा से नहीं आती है
सच्ची ख़ुशी अभावो के भीतर आत्मा को निखरा  हुआ पाती है
आत्मीयता की ऊर्जा पाकर जीवन में सक्रियता सदभाव  फैलाती है
आपसी सद्भाव से ही पाया उल्लास है
खुशिया चहु और बिखरी रहे मिलता रहे विश्वास  है

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

गलतिया

जीवन में गलतिया हर व्यक्ति से होती है
परन्तु गलतियों की पुनरावृत्ति बुरी आदतों का कारण होती है
बुरी  आदते व्यक्ति को अपराधी बना देती है
जब लोग गलतियों को बर्दाश्त करते है
 तो व्यक्ति स्वयं को सही मानने का भ्रम पाल लेता है
अपराध की तह तक जाने के लिए
अपराधी की मानसिकता तक जाना होता है
अपराधी के मनो मष्तिष्क के भीतर विचरने वाले विचारों
 षड्यंत्रों को पाना होता है
इसलिए गलतियों को मत दोहराओ
गलतिया करने वालो को
 जहा  भी अवसर मिले गलत जरुर ठहराओ
यह सच है इंसान गलतियों का पुतला है
पर गलतिया करते हुए यहाँ कोई इंसान नहीं निखरा है
गलत स्पष्टि करणों  से झूठा हुआ आदमी 
व्यक्तित्त्व बिखरा है

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

विमल मति

ज्योति रूप परमात्मा, द्वादश ज्योतिर्लिंग
आलोकित अंतर करे ,शिव मंदिर शिव लिंग

परम पिता परमात्मा ,माता पार्वती
महादेव दो वर हमें ,हो निर्मल मन विमल मति

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

चिंतामन है शिव

परम धरम अनुराग है ,करम धरम की नींव 
तू क्यों चिन्तारत हुआ ,चिंतामन है शिव 

सावन होता हरा भरा ,हरियाता हर खेत 
नदिया लाई अपने साथ, कितनी सारी रेत 

भाग्य रथी  भागीरथी ,भव के हरते पीर 
जीवन सुखमय कर देता ,मन का निर्मल नीर

राज गए राजा गए ,चले गए सम्राट 
जर्जर  काया होत रही, पकड़ी सबने खाट 

बारिश झर -झर  बरस  रही, सरिता हुई निहाल
तट सेतु अब टूट गये ,मैदानों में ताल  

रविवार, 4 अगस्त 2013

कौन नहीं चाहता

संसार  में कौन नहीं चाहता की उसके शत्रु नहीं हो ?
यह धरा सभी और मित्रो और हितैषियो सी घिरी हुई हो
कौन नहीं चाहता की वह सभी प्रकार की आशंकाओं और भय से मुक्त हो ?
सभी प्रकार से सुरक्षित हो जीवन आनंद और उल्लास से युक्त हो
कौन चाहता वह योध्द्दा अपराजेय हो ?
वैभव और ऐश्वर्य से हो युक्त होती रहे चहु और उसकी जय जय हो
संसार में कौन नहीं चाहता वह गुणवान और विद्वान हो ?
महकती रहे यामिनी बिखरी  तारो सी  मुस्कान हो
कौन चाहता वह सूर्य सा तेजस्वी हो ?
व्यक्तित्व में हो शीतलता व्यक्तित्व ओजस्वी हो
पर इतना सब कुछ  चाहने से क्या होता है
पल्लवित परिवेश में वही  होता है 
 जैसा हमारे कर्म का बीज होता है

बुधवार, 10 जुलाई 2013

आस्था

  विश्वास  जब श्रध्द्दा  के वसन  धारण  कर  लेती  है 
तो आस्था  बन  जाती  है 
हजारो  आस्थाये जब  प्रतिमा पर एकत्र  हो जाती  है 
तो प्रतिमा  प्रतिमा नहीं रह जाती 
मंदिर में जीवंत  हो वह  देवता और  देवी  कहलाती  है  
आराधना जिसकी हम करे 
वे हमारे  आराध्य  कहलाते है 
अनिष्ट  का  हरण  करे 
अभिष्ट  की पूर्ति करे हम  उन्हें ईष्ट  कहते  है 
ईष्ट  हमारी  साँसों  में और ईष्ट के भाव  लोक  में  हम  रहते है 
आलॊकित करे अन्तर्मन  को 
उस व्यक्तित्व  को हम महापुरुष , संत, महंत , कहेंगे 
जीवन  की सकारात्मकता  को छोड़ कर 
तो हम भयभीत  ही रहेंगे 
अच्छाई जब नहीं मिल पाती है
 तो आशाये बिखर बिखर जाती है 
सद  विचारों के बीच पाकर यह आत्मा  
अपनी वास्तविकता समझ  जाती है 
अंधियारे  के  भीतर  हलकी सी रोशनी 
जहा  जहा  भी नजर आती है 
 अनुभूतिया  अवतरित  हो 
परम  सत्ता  की नजदीकिया  पाती  है 
पी  ले हलाहल  का   प्याला 
तो व्यक्तित्व शिव  शंभू  कहलाये 
भूंखे  नंगे को दे  निवाला 
तो  विश्वनाथ   बन  कर आये 
सज्जनों  का पाकर  साथ तन   चंगा 
और यह  मन  गंगा  में नहाये 

हँसते हँसते मिट जाते हैं

अब भाव नही होते दर्पण  जो आँखो से दिख जाते है  न रही  चेतना चिन्गारी  अब कलमकार बिक जाते है  कोई स्वार्थ साथ आबाद रहा  तलवे सत्ता के चाट रहा...