मंगलवार, 19 मई 2020

मेरा हिंदुस्तान

थोड़ी सी भी छांव नही ,घर मे नही सकून
लथ पथ लथ पथ देह हुई महीना है मई जून

चलते चलते उठा  गिरा , बेबस एक इंसान
अपने घर कब जाएगा मेरा हिंदुस्तान

बच्चे आँसू पोंछ रहे ,पूंछे एक सवाल
कोरोना क्या भूत रहा? जो खाली चौपाल

शव इतने कि गिने नही , कैसा है यह रोग
दूर से ही तुम नमन करो , दूर से पावाधोग

बुधवार, 13 मई 2020

कितने ही मजदूर

पथ पर न गंतव्य मिला चल चल कर बेहाल
सडको पर है भूख मिली कर लो तुम पड़ताल

अपने घर से दूर हुए मरने को मजबूर 
 सपनो से वे छले गये कितने ही मजदूर

पग पग छाले भरे हुए  चेहरे हुए मलीन
मजबुरी के साथ रहे , मजदुरो के दिन

कैसा चिर विश्वास रहा कैसा रहा जूनून
पैदल पैदल चले गए ,पटना देहरादून   

सडको पर है आग लगी चली न देहरादून 
कटने को मजबूर हुए , पटरी पर है खून

कोरोना के साथ रहा महीना मई और जून
दाढ़ी मूंछे कटी नही , सिली नही पतलून 

पग में छाले भरे हुए , हरे हुए है घाव 
दुखियारी और हारी माँ भावो पर पथराव



शनिवार, 25 अप्रैल 2020

परशुराम

धन वैभव की चाह नही ,था योगी का हठ
परशु को न बांध सका अत्याचारी शठ

अक्षय ऊर्जा साथ रहे , भगवन दो वरदान
सत का संग कर पाऊ मैं , जैसे परशु राम

दीन दुर्बल के रक्षक थे परशु धारी राम 
हे!भगवन सब कष्ट हरो , तुमको करु प्रणाम

सत्ता से वे दूर रहे , शोषित जन के साथ
शत्रु का साम्राज्य ढहा, परशु जी के हाथ

पद पैसे की चाह नही , घर जैसे हो नीड़
सत का बल ही चाहिए, नही चाहिए भीड़


सोमवार, 20 अप्रैल 2020

सूरज की पीड़ा

सूरज पूरब से उग कर यह बताता है 
रात भर सोया नही कर्तव्य याद आता है

सूरज हुआ अस्ताचल छटाएं  बिखरी है
हुई पर्वत श्रेणियां पुलकित घटाये निखरी है

शब्द भी साथ नही , भाव हुए भारी है 
अरमान के आसमा पे अब सूरज की बारी है 

घाव पाये कितने ही , दर्द बहुत झेला है
अग्नि के पथ रथ है सूरज अकेला है

हट जा रे अंधियारे पथ बहुत काला है
अग्नि में तप तप कर पाया उजाला है


रविवार, 12 अप्रैल 2020

पत्नी देवीं नमो नमः

पत्नी देवी नमो नमः हो घर की तुम ताज
तुमसे से ही सुख शांति रहे , मत हो तू नाराज़

जब से तेरा साथ मिला तन मन है गदगद
जिज्ञासा भी शांत हुई जानी खुद की हद

पत्नी के ही पाव पड़ो,पत्नी को दो भाव 
पत्नी से ही तृप्ति मिली ,पत्नी देती घाव

हर दर्पण में देख छवि होता हूँ मै धन्य
पत्नी से ही प्रीत रही ,भक्ति है अनन्य

पत्नी पथ पर साथ रहे , जीवन हो आबाद
जो उसके संग रह न सका , बिल्कुल है बर्बाद 

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

चली वह निरन्तर खुशी पा रही है

बही जा रही है बही जा रही है 
नदी बन तरलता ,बही जा रही है 

शीतलता सरलता  उसने है पाई
छलकती हुई वह लहरा  रही है

न घबरा रही है न शर्मा रही है 
सिमटती उफनती चली जा रही है

कहा जा रही है यह पता ही नही है 
ढलानों पे हो कर वह गहरा रही है 

नही वह थकी है  नही वह रुकी है
चली वह निरंतर खुशी पा रही है

उजाले की किरण रही वह कभी तो
छवि अस्ताचल की  नज़र आ रही है

मैला जो जल है उसी का है हिस्सा
वह मानव के हाथों ठगी जा रही है 

कभी बनती रेवा तो कभी होती गंगा
वह हाथो से अस्थि कभी पा रही है 

यहाँ है वहा है  मनुजता कहा है ?
मनुज मन है मैला वह सजा पा रही है 

कभी अतिवृष्टि कभी है बवंडर 
कभी आंधियो से लड़ी जा रही है 

रविवार, 5 अप्रैल 2020

अहिंसा में बल

कोरोना यदि जीत गया ,होगी हर दम मौत
यम नियम के दीप जला , संयम की जीत होत

जप तप का बल जिसे मिला ,हो जाता वह धीर
सचमुच में योध्दा वही  ,सचमुच में शूरवीर

मत जग मे तू आग लगा, करुणा कर हर पल
महावीर और बुध्द कहे, अहिंसा में बल

महावीर तो चले गए ,देकर यह उपदेश 
संतोषी ही सुखी रहे ,सज्जन को न क्लेश