यह कैसा होता बंधन हैं
ये होता कैसा नन्दन है
ये भाव अनोखे भरे भरे
ये रिश्ते होते खरे खरे
शब्दों के मोती झरे झरे
इन आँखो में अभिनन्दन है
हृदय से निकला वंदन है
ये मोर पंख की सुंदरता
इस नभ से अमृत है बटता
जीवन से रस न हैं घटता
यहां समरसता का चंदन है
देखा दुखियो का क्रंदन है
जिन आँखों में है प्यार रहा
उन आँखों में आभार रहा
सबको ईश्वर है तार रहा
प्राणों से उसके तार जुड़े
ये प्राणों का स्पन्दन है
बहुत भावपूर्ण रचना। आपने प्रेम, अपनापन, कृतज्ञता और आध्यात्मिक भावों को बहुत सहज शब्दों में पिरोया है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.
जवाब देंहटाएंअधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
धन्यवाद!
बहुत सुंदर भावमय रचना
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में 11 जुलाई, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंWahhh ❤️
जवाब देंहटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंअति प्रशंसनीय रचना
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना
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