मंगलवार, 7 जुलाई 2026

देखा दुखियों का क्रंदन है


यह कैसा होता बंधन हैं 
ये होता कैसा नन्दन है 

ये भाव अनोखे भरे भरे 
ये रिश्ते होते खरे खरे 
शब्दों के मोती झरे झरे 
इन आँखो में अभिनन्दन है 
हृदय से निकला वंदन है 

 ये मोर पंख की सुंदरता
 इस नभ से अमृत है बटता 
जीवन से रस न हैं घटता 
यहां समरसता का चंदन  है 
देखा दुखियो का  क्रंदन  है 

जिन  आँखों  में  है  प्यार  रहा 
उन  आँखों  में  आभार  रहा 
सबको  ईश्वर है  तार  रहा 
प्राणों  से  उसके  तार  जुड़े  
ये  प्राणों  का  स्पन्दन  है 


8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत भावपूर्ण रचना। आपने प्रेम, अपनापन, कृतज्ञता और आध्यात्मिक भावों को बहुत सहज शब्दों में पिरोया है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.

    अधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
    धन्यवाद!

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  2.  आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में  11 जुलाई, 2026 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in  पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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