सोमवार, 30 अप्रैल 2012

हे मात! तेरे ही लिये


हे मात! तेरे ही लिये ,निज प्राण का उत्सर्ग है
निर्झर नदी हिमभूमी पर्वत,विकसित धरा है स्वर्ग है

ऋतुये विविध चहु  और है जन्मे यहा पर देव है
रही क्यारिया केसर भरी लटके यहा फल सेव है
तन-मन हुये पुलकित नयन बिखरा यहा निसर्ग है
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मधुपान करता है जीवन ,तपोभूमी पर है आचमन 
खेले यहा राधा-रमण,श्रीराम का वन मे गमन
सभी धातुये तुझमे रही ,रहता यहा हर वर्ग है
सेवा करे रेवा सदा ,निमाड है मालव भूमी
पर्वत खडे महादेव से,ऊँची चोटिया नभ ने चूमी
शिव शक्ति सा है आचरण ,उनका यहा संसर्ग है

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

क्षितिज के उस पार है

खिलखिलाई  सुबह होगी, झिलमिलाती शाम होगी
तज थकन तू बढ मुसाफिर ,जिन्दगी वरदान होगी

पत्थरों सा जो पड़ा है ,वह शिखर पर कब चढ़ा है 
जो चेतना रसपान करता ,तारे सा नभ में जड़ा है 
छोडकर मन की उदासी,मुस्कान न मेहमान होगी
 
उम्मीदो के आशियाने ,क्षितिज के उस पार है
घोर तम में कर परिश्रम तू जीत का हकदार है 
ठोकरे जो भी मिलेगी ,तेरी ही गुलाम होगी


प्रश्न कितने तेरे मन मे ,है चुनौतिया जीवन मे 
लोहे से कुन्दन बन जा, चिंगारिया है तन-मन  मे
चढ गिरी की घाटीयों पर,चिर विजय तेरे नाम होगी

रोने से फल क्या मिला है,चलने से मिलता किला है
दे हौसलो को तू बुलन्दी,मरुथल मे मृदुजल मिला है
काया को कर तू निरोगी,माया से पहचान होगी

रविवार, 15 अप्रैल 2012

समय

रवि रश्मि  सत रंग है,सप्त रहे है दिन
सप्त सूर की साधना,लाभान्वित अनगिन

सूर्य समय के साथ है,चला काल का चक्र
सूर्य देव को कोटि नमन,हटे द्रष्टिया वक्र

समय गान को गाईये,समय बडा रंगीन
श्रम के हाथो आज रहा ,परिश्रम बिन दीन

समय परे जगदीश है,सार समय है बीज
समय प्रमेय का खेल रही,तिथिया आँखातीज

समय गुरू और  शिक्षक है, सीख सके तो सीख
सीख रही दुनिया सारी ,तू क्यो मांगे भींख

समय काल महाकाल है,काल बना विकराल
प्रतिपल बीता जात रहा है,बनो काल के लाल

पल-पल नभ पर चढता सूरज,ढली शाम बनी रात
सूत्र समय का फिसल गया है,व्यर्थ रह गई बात

स्वर्ण समय है चांदी है,मोती माणिक रत्न
मूल्यवान को मिल जायेगा,कर ले सारे यत्न

समय शिव का भाल है,भावी की है नींव
जो पल पल को पूज रहा,सदा सुखी वह जीव

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

बारिश का मौसम क्या ? गर्मी का बेटा है

मौसम ने तन-मन को लू से लपेटा है
बारिश का मौसम क्या ? गर्मी का बेटा है

जीव-जन्तु अकुलाये सहमे हुये है साये 
खग-दल है गुम सुम  ठहरे पल अलसाये
चल-चल कर मरूथल मे भाग्य गया लेटा है

पतझड़ ने झड़-झड़ कर पत्ते खूब बरसाये 
तकदीर से लड़ -लड़ कर मंजिल को हम पाये
दुःख दर्द हर  गम को आँचल मे समेटा है

जीवन का संगीत तो धीर वीर ने गाया है
यमुना के तीर से ही बांसुरी स्वर आया है
पर्वत है गोवर्धन  , ग्वाला -दल बैठा है

गुरुवार, 29 मार्च 2012

दे बुध्दि माँ शारदे,बन जाऊ मै बुध्द







 
बुध्दि के बिन ज्ञान का, क्या होता उपयोग
बुध्दि ही तो ज्ञान देत ,दे उद्यम उद्योग

दे बुध्दि माँ शारदे,बन जाऊ मै बुध्द
निर्मल पावन ज्ञान मिले ,आचरण हो शुध्द

शुध्द चित्त का मंत्र ही ,गायत्री को जान 
आत्मा को उत्थान मिले ,मिले मोक्ष निर्वाण

ज्ञान दायिनी शारदे, मुझको कर विद्वान
बुध्दि की विशुध्दी मे ,निहीत सच्चा ज्ञान

ब्रह्मदेव मे ब्रह्म बसे,दूर हो मन के भ्रम
ब्रह्मा संग माँ शारदे, अनुकुल फल दे श्रम

छल से बिगड़ा आज है ,छल से बिगड़ा कल
 बुध्दि अति बलवान  है ,बुध्दि है बीरबल

बुध्दि में ही ज्ञान रहा  ,बुध्दिमान हनुमान 
बिन बुध्दि के ज्ञान रहा ,रावण का अभिमान 

सदबुध्दी के साथ रहे ,राम कृष्ण भगवान 
 ज्ञान गया दुर्बुध्दी का  , खोया पद सम्मान 


सोमवार, 26 मार्च 2012

कहाँ मेरे कृष्ण है

खोजता चारो तरफ मै कहाँ मेरे कृष्ण है 
पंथ पर कठिनाईया है और ढेरो प्रश्न है

ख़्वाब के जो थे किले वे खंडहर बन ढह गये 
भाग्य में जो दुख लिखे थे जिंदगी भर रह गये 
कुचलती सम्भावनाये ,होते नहीं अब जश्न है 

पाने को उत्सुक रहा हूँ  इष्ट तेरी साधना है 
राधे भी तुम ही हो मेरे ,तू मेरी आराधना है 
 टूटती मनोकामनाये,उलझे हुए कई प्रश्न है 

हो रही है हर दिशा में स्वार्थ की ही जंग है
कर्म क्षेत्र में खड़े पर  सारथे नहीं संग  है 
आचरण है छल कपट के पर सत्य ही वितृष्ण है

भावो  की खो गई सीता ,फैला हुआ चहु छद्म है 
गीतों में बसती न गीता ,काव्य नहीं पद्म है 
कृष्ण को मिलता न अर्जुन,पार्थ को न कृष्ण है

फूलो सा स्पर्श है

प्रियतम मेरा चाँद है ,सागर का किनारा  है
उसकी यादो को सीने से लगाया है संवारा है
फूलो सा स्पर्श है,प्रियतम ह्रदय का हर्ष है 
प्रियतम बिन यह दिल पागल है आवारा है

ठहर हुई हवाए है सताती उसकी याद है
सोचता हूँ सुन ले वह दिल की फरियाद है
समाई है वह साँसों में और अहसासों में
वह बनी आँखों की नींद ,जीवन का  स्वाद है

हँसते हँसते मिट जाते हैं

अब भाव नही होते दर्पण  जो आँखो से दिख जाते है  न रही  चेतना चिन्गारी  अब कलमकार बिक जाते है  कोई स्वार्थ साथ आबाद रहा  तलवे सत्ता के चाट रहा...