जिसने तिरस्कार सहा
किया है विष का पान
जीवन के कई अर्थ बुने
उसका हो सम्मान
कुदरत में है भेद नहीं
कुदरत में न छेद
कुदरत देती रोज दया
कुदरत करती खेद
जिसने सारा विश्व रचा
जिसका न आकार
करता है जो ॐ ध्वनि
ईश्वर वह ओंकार
है अंधेरा तो उजाला भी यहां पर आयेगा यह मयूरा वन के भीतर इस तरह हर्षायेगा जिंदगानी लेगी करवट लौट जायेगी जवानी पानी पानी हर समस्या याद न...