जिसने तिरस्कार सहा
किया है विष का पान
जीवन के कई अर्थ बुने
उसका हो सम्मान
कुदरत में है भेद नहीं
कुदरत में न छेद
कुदरत देती रोज दया
कुदरत करती खेद
जिसने सारा विश्व रचा
जिसका न आकार
करता है जो ॐ ध्वनि
ईश्वर वह ओंकार
थोडी थोड़ी गल रही है थोड़ी थोड़ी जल रही है है पुरानी वेदनाये गीत में जो ढल रही है जो हमारे हित में थीं जो तुम्हारी...
ॐ तत् सत्
जवाब देंहटाएंसुंदर
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