कही ऊंचे पर्वत तो कही गहरी खाई
शिखर से वो झर के नदी बन के आई
नदी बन के तोड़े है अहम के वो पर्वत
अहम को मिटा कर है गहराई पाई
हर दिल को वो जीत गया
अच्छा एक इन्सान
जीवित स्वाभिमान रखा
जीवित रखा ईमान
थोडी थोड़ी गल रही है थोड़ी थोड़ी जल रही है है पुरानी वेदनाये गीत में जो ढल रही है जो हमारे हित में थीं जो तुम्हारी...
सुंदर
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