गुरुवार, 27 मार्च 2025

आस्था की झांकी

खिला है सरोवर 
खिला है किनारा
किया है किसी ने 
कमल को ईशारा
बना है यहां पर 
जल का है दर्पण
क्षितिज से उदित हो 
सूरज है पधारा

थोड़ा सा सफर है 
जीवन का है बाकी
थकन नहीं मिटती 
पिला दे है साकी
कहा गए अपने 
अधूरे है सपने
देखे नहीं दिखती है
आस्था की झांकी


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