शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

टिक रहा विश्वास है

प्रकृति की वंदना का 
होता तरीका खास है
निसर्ग में है स्वर्ग रहता
 स्वर्ग अब वनवास है

उत्थित हिमाचय के हृदय में
सहजता का वास है
टहनियां और फूल पत्ते
 कुदरती उल्लास है

जो रहा निर्भीक सा मन 
जिंदगी वह खास है
हट रहा तम हर सवेरे
मन में जगा विश्वास है

फिर नया जीवन पाया
पायी फिर से आस है
हर्ष में  है मग्न सारे
जग मग नया आकाश है
 

स्वर्ग भी उतरा जमीं पर
स्वर्ग का अहसास है
लक्ष्य की एक भूख सी है
हर मन मचलती प्यास है

धर चला अंगुल रथ पर
हे पार्थ क्यो? उदास है
 इंदु है वह  सिंधु गहरा
बिंदु मे ठहरी आस है

हर कही पाया है उसको 
रचता रहा वह रास है 
पिय मिलन आतुरता है
टिक रहा   विश्वास है

बुधवार, 31 जनवरी 2018

शून्य रहा परिवेश

आग दिलो में लगी हुई ,राग घृणा और द्वेष 
करुणा और वात्स्ल्य नहीं ,बचे यहाँ पर शेष 
 
अंतर्मन में ध्यान करो  बाहर हो मुस्कान
प्यारा भरा मन तृप्त रहे कर लो रस का पान

जीवन सारा बीत गया रह गई मन में टीस 
मन है प्यासा मीत नही दुश्मन है दस बीस

अर्ध सत्य तो व्यर्थ रहा , सत्य रहा न शेष 
सतगुण सारे लुप्त हुए ,शून्य रहा परिवेश

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

धन तेरस पर तुम भी सुन लो

निर्धन को न धन मिलता है 

धन के बिन कैसा त्यौहार

धन के बिन है मस्त फकीरा

 धन हेतु रौता बाजार

 

धन तेरस पर क्या क्या लाये 

 धन सच्चा होता व्यवहार

मन निर्धन तो कैसा धन है

 तन मन वारो बारम्बार

 

ऐसा वैसा कैसा कैसा

 कदम कदम पर पैसा

पैसो से है जुड़ता रिश्ता 

पैसो पर है दारोम दार

 

धन से न मिल पाया तन है

 धन देता केवल श्रृंगार

धन के पीछे सब है भागे

 धन से होती है तकरार 

 

धन पे तेरी नियत ठहरी 

मन से मन की है दीवार

तू खूब खैले धन से मैले 

धन न मिलता है हकदार

 

सपने तुम कितने भी बुन लो

 धन तेरस पर तुम भी सुन लो

खाया पिया नहीं पचाया 

धन से भोजन स्वल्पाहार

बुधवार, 27 सितंबर 2017

महिमा की माँ गात रहा


  1.  

    माता मेरे साथ रही ,ममतामय परिवेश

    अंचल में वात्सल्य भरा ,करुणा का है देश


    माँ मन में विश्वास रहे, मन न हो निर्बल

    मन में ऊर्जा व्याप्त रहे ,श्रध्दा और सम्बल


    माँ शक्ति का रूप है, धन वैभव का स्रोत

    भक्ति से भरपूर रहे ,जलती पावन जोत


    माँ की ममता जिसे मिली ,धन्य हुआ वह जीव

    संवेदना से शून्य रहा ,ह्रदय विहीन निर्जीव


    महिमा की माँ गात रहा ,ग्रन्थ संत और श्लोक

    माँ के नयनो नीर बहा ,डूब गए तीन लोक


    माँ तेजोमय रूप है, होती ज्योति रूप

    पोषण पालन देती रही ,देती छाया धूप

     

    माँ प्रीति की गंध लिए रागिनी है राग

    भोजन माँ का पुष्ट करे जग जाते है भाग

    माँ के चरणों आज रहा होता भावी कल

    माँ की करुणा उसे मिली होता जो निश्छल

     

    हे माँ तेरी कृपा मिले तव चरणन की धूल

    जलते आस्था दीप रहे हो आलोकित हो मूल

     

    माँ की हर पल याद रही मात रही हर अंग

    माँ का मस्तक हाथ रहा जीत गए हर जंग

     

    जब तक चलती सांस रहे ममता हो विश्वास

    अवचेतन भी तृप्त रहे मिट जाए संत्रास

     

    माँ की शक्ति साथ रही साथ रहा आशीष

    भय बाधा से मुक्त हुए निर्भीक हुई हर दिश

    माँ नदिया सम साथ रही सिंचित होते खेत

    हर जन बुझती प्यास रही शिव के दर्शन देत


     

रविवार, 24 सितंबर 2017

पूज्य कर्म पर मौन

राग द्वेष तव चित्त रहा, फिर कैसा उपवास
खुद के ही तुम पास रहो, खुद मे कर तू वास

निज कर्मो पर ध्यान धरो ,निज अवगुण को देख
घटी उमरिया जात रही , मिटी भाग्य की रेख
 
पूजा में तू लिप्त रहा, पूज्य कर्म पर मौन
शुध्द कर्म और आचरण ,धरता है अब कौन

सदाचार सद वृत्ति रहे, अवगुण कर दू त्याग
माता मन से दूर करो, लालच और अनुराग
 
 

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

बुझी हुई राख

जले हुए कोयले है ,बुझी हुई राख
मिटटी में मिल गई ,बची खुची साख

वैचारिक दायरो में कैद हुए मठ
 हार गई अच्छाई जीत गए शठ
आस्थाये जल गई  आशा हुई
ख़ाक
लूट गई लज्जा है ,कहा गई धाक 

उजड़े हुए आशियाने ,जल गए पंख
आस्तीन में छुप गए , दे गए डंक
उल्लू की बस्तिया है, झुकी हुई शाख
सूजे हुए चेहरे है , सूजी हुई आँख


जीवन की सरसता

सरलता रही है तरलता रही है
सरल और तरल बन सरिता बही है

जीवन की सरसता यही पर कही है
 प्रफुल्लित हुआ मन सहजता यही है

करम ही धरम है करम की बही है
 शिथिल सा रहा जो ईमारत ढही है

सदा वह मरा है जो जरा भी डरा है
निडरता जहाँ पर सफलता वही है

नरम है गरम है भरम ही भरम है
गगन से क्षितिज है इधर तो मही है

लगन है अगन है मगनमय जीवन है
ऋतु है शरद की कही अनकही है

हँसते हँसते मिट जाते हैं

अब भाव नही होते दर्पण  जो आँखो से दिख जाते है  न रही  चेतना चिन्गारी  अब कलमकार बिक जाते है  कोई स्वार्थ साथ आबाद रहा  तलवे सत्ता के चाट रहा...