कुल्हड़ की
वह चाय नहीं है
मैथी का न साग
चूल्हे में
वह आग नहीं
कंडे की न राख
माटी की सुगन्ध
है बिछड़ी
कहा गई वह
प्यारी खिचड़ी
जितने भी थे
रिश्ते बिखरेलगे स्वार्थ के दाग
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...