चमके नभ पे अंधियारे में
तारो से कितने बिन्दु
नीला सा उन्मुक्त गगन है
नीला नीला है सिन्धु
पीड़ाएं तन मन की हरती
चिड़िया से चहकी यह धरती
कुदरत रानी खिली हुई है
खिला हुआ नभ पर इंदु
अंधियारा रह रह कर आंसू को पीता है चलते ही रहना है कहती यह गीता है कर्मों का यह वट है निश्छल है कर्मठ है कर्मों का उजियारा युग युग तक जीता ह...
सुंदर सृजन
जवाब देंहटाएंसुंदर मनमोहक
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