शनिवार, 12 दिसंबर 2020

ईश्वर होता व्यक्त नही

सच्ची प्रीति कहा गई , भोले जो थे लोग
भोलेपन को भूल गये , कैसा है दुर्योग

सीधा सच्चा धर्म कहा, सीधा सच्चा पथ
इतने बढ़ते स्वार्थ गये,करता क्या समरथ

ईश्वर होता व्यक्त नही , वह तो है अहसास
व्यक्ति से क्यो टूट रहा, व्यक्ति का विश्वास

सुख दुख में सामान्य रहा, पल पल है स्वीकार
उस पर होती ईश कृपा, उसकी जय जयकार


2 टिप्‍पणियां:

हँसते हँसते मिट जाते हैं

अब भाव नही होते दर्पण  जो आँखो से दिख जाते है  न रही  चेतना चिन्गारी  अब कलमकार बिक जाते है  कोई स्वार्थ साथ आबाद रहा  तलवे सत्ता के चाट रहा...