सुखद और दुखद पल
नदी ने जिया है
रेतीली डगर पर
सफर तय किया है
बिखरते हुए पल
फिर भी न बिखरी
दिया जग को अमृत
जहर खुद पिया है
नदी के किनारे
ओझल हो मुमकिन
मिले न सहारे
हो कठिनाई अनगिन
अंधेरे में दीपक
बनकर जलेंगे
रहे हौसले तो
बदलेंगे ये दिन
तय जो कर पाई समय को, खो गई कोई सदी है खोह, पर्वत, खाइयों से बहकर आई नदी है पत्थरों से जो संवरती, गीत में संगीत भरती, खोजती अपना धरातल, हौसलो...
नदी प्यारी नदी !
जवाब देंहटाएंDhanyawad
जवाब देंहटाएंसुंदर सृजन
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