Srijan
सोमवार, 10 फ़रवरी 2025
पड़ी है दरारें
रही न मोहब्बत
बनी है मीनारें
खींची हुई लंबी
ऊंची सी दीवारें
रिश्तों में ऐसा
लगा हुआ पैसा
पैसों बिन यहां
पड़ी हुई दरारें
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अपनो को पाए है
करुणा और क्रंदन के गीत यहां आए है सिसकती हुई सांसे है रुदन करती मांए है दुल्हन की मेहंदी तक अभी तक सूख न पाई क्षत विक्षत लाशों में अपन...
वेदना ने कुछ कहा है
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