गीतों की धारा ने है
सौंदर्य गाया
गजल डूबी गम में
छंद मुस्कराया
कभी व्यंग करते
दोहे रहे है
साहित्यिक सुरों से
सृजन खिलखिलाया
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...
वाह
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