Srijan
शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025
हिलेंगे डूलेंगे
रहे है अंधेरे तो
उजाले मिलेगे
खुली होगी बस्ती
ताले खुलेगे
पथ पर कठिनतम
हुई साधना है
अडिग है जो पत्थर
हिलेंगे डूलेगे
3 टिप्पणियां:
Onkar
17 फ़रवरी 2025 को 5:41 am बजे
सुंदर
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सुशील कुमार जोशी
17 फ़रवरी 2025 को 9:05 am बजे
सुन्दर
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Rupa Singh
17 फ़रवरी 2025 को 9:18 am बजे
बहुत खूब
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