शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025

हिलेंगे डूलेंगे

रहे है अंधेरे तो  
उजाले मिलेगे
खुली होगी बस्ती 
ताले खुलेगे
पथ पर कठिनतम 
हुई साधना है
अडिग है जो पत्थर 
हिलेंगे डूलेगे 

3 टिप्‍पणियां:

पर कुछ न कुछ तो लोच है

  अब  यहां  उत्तर  भटकते  और  खटकती सोच  है  पंख  फैले  पंछीयो  के   दिख  रही  यहां  चोंच  है  अब  हमें  परछाईयों   गहराइयों  को  जानना  है ...